राजस्थान इतिहास के प्राचीनतम शिलालेख Part-2

Oldest Inscriptions in Rajasthan History

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राजस्थान इतिहास के प्राचीनतम शिलालेख जैसा की आप सभी जानते है इतिहास की सत्यतता का प्रमाण पाए जाने वाले अवशेषों एवं कुछ ऐसी सामग्रियों से मिलती है जो आज से बहुत प्राचीन होने के साथ साथ हमे उस समय के सभी अस्तित्वों का बोध कराता हो । इन प्राचीनतम स्त्रोतों में से एक है शिलालेख जिनसे वास्तव में किसी स्थान और उसकी सभ्यता, संस्कृति, मंदिर, महल, राजाओ, शासको प्रजाओं और कुछ महत्वपूर्ण घटनाओ के बारे में उल्लेख एवं प्रमाण मिलते है। तो आज हम ऐसे ही प्राचीनतम शिलालेखों के बारे में आपको बताना चाहते है जो राजस्थान के इतिहास को प्रमाणीत करता है। राजस्थान इतिहास के पुरातत्विक स्त्रोत्र – Rajasthan History

शिलालेख

इसमें शिला अथार्थ पथर पर लिखे सभी प्रकार के लेखो ग्रंथो उपनिषदों आदि का प्रमाण मिलता है।

बड़ली का शिलालेख

  • यह शिलालेख 5 वि सदी ईसा पूर्व का है 
  • यह शिलालेख अजमेर के बड़ली गांव के निकट भीलोत माता के मंदिर के पास प्राप्त हुआ था।
  • इसके खोजकर्ता g.h ओझा थे 
  • यह शिलालेख राजस्थान का सबसे प्राचीनतम शिलालेख है 
  • यह शिलालेख संस्कृत एवं लिपि ब्राह्मी भासाओ में लिखा है।

घोसुण्डी शिलालेख 

  • यह 2 सदी ईसा पूर्व का है 
  • यह शिलालेख चितोड़ के घोसुण्डी गांव से प्राप्त हुआ था।
  • इसके खोजकर्ता डॉ भंडारकर है 
  • वर्तमान में यह शिलालेख उदयपुर के म्युसियम संग्रहालय में रखा है।
  • इस शिलालेख में भगवत सम्प्रदाय का उल्लेख मिलता है यही भगवद सम्प्रदाय वैष्णव सम्प्रदाय के नाम से भी जाना जाता है (vishnav सम्प्रदाय पर्यावरण एवं वन्य जिव संरक्षण के लिए विश्व विख्यात है )
  • इस शिलालेख में सबसे पहले अश्वमेघ यह्य के बारे में जानकारी मिलती है।

मनमोरी का शिलालेख

  • यह शिलालेख 713 ईसा पूर्व का है।
  • इसके खोजकर्ता कर्नल जेम्स टॉड थे।
  • इसके लेखक पुष्य एवं उत्कीर्णन शिवादित्य द्वारा किया गया था।
  • यह शिलालेख चितोड़ जिले के पुढौली गांव के निकट मानसागर झील से प्राप्त हुआ।
  • इस शिलालेख में मौर्य वंश के शाशक मान, महेश्वर, भीम तथा भोज राजाओ का उल्लेख मिलता है।
  • इस शिलालेख में देवताओ एवं असुरो के बिच हुए समुद्र मंथन का भी उल्लेख है।
  • बाद में जब कर्नल जेम्स टॉड वापस इंग्लैंड जा रहे थे तो उन्होंने इस शिलालेख को समुद्र में फेक दिया था। 

घटियाला शिलालेख 

  • यह 861 ईसा पूर्व का है 
  • यह शिलालेख जोधपुर जिले के मंडोर के घटियाला गांव से माता की शाल नमक मंदिर के पास प्राप्त हुआ था।
  • प्राचीन काल में यह मंदिर नहीं अपितु एक जेन मंदिर था।
  • इस मंदिर से तो शिलालेखों के स्तम्भ प्रपात हुए है जिसमे पहला स्तम्भ प्राकृत भाषा में तथा दूसरा संस्कृत भाषा में है।
  • संस्कृत भाषा वाले शिलालेख में गणेश जी की प्रतिमाये भी है इसलिए इसे गणेश स्तम्भ भी कहते है ।
  • इसके लेखक मग एवं उत्कीर्णन कृष्णेश्वर थे।
  • इस शिलालेख में मंडोर के गुर्जर प्रतिहार के शाशक कक्कुक प्रतिहार का उल्लेख मिलता है यह गुर्जर प्रतिहारी के अंतिम शाशक थे।
  • इस शिलालेख में यह भी मिलता है की घटियाला गांव का प्राचीन नाम रोहिन्सकूप था।
  • राजस्थान में सती प्रथा का उल्लेख सबसे पहले इसी शिलालेख से प्राप्त हुआ है जिसमे रेणुका नाम की महिला अपने सैनिक पति के साथ सती होने का उल्लेख है।
  • इस शिलालेख में गुर्जर प्रतिहारो द्वारा घटियाला क्षेत्र के अभिरो या अहिरो के दमन का उल्लेख है। यह अभिर ही यादव समाज के लोग थे।

बसंतगढ़ शिलालेख 

  • यह शिलालेख 625 ईसा पूर्व का है।
  • यह शिलालेख बसंतगढ़ के क्षेमंकरी माता मंदिर जो की सिरोही में है से प्राप्त हुआ था।
  • क्षेमंकरी माता को ही खेवल माता के रूप में जाना जाता है जिनका मंदिर सिरोही  में स्थित है।
  • इस शिलालेख में राजस्थान को राजस्थान आदित्य नाम से सम्बोंधित किया गया है।
  • इस शिलालेख के अनुसार क्षेमंकरी माता मंदिर का निर्माण वर्मलात नमक राजा द्वारा कराया गया था।
  • ऐसा मानना है की क्षेमंकरी माता जी ने यहां उत्तमौजा नामक राक्षस का वध किया था।

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