राजस्थान इतिहास के पुरातत्विक स्त्रोत्र – Rajasthan History

Archaeological sources of Rajasthan history (Rajasthan ke Itihas Ke Pramukh strot)

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राजस्थान इतिहास के पुरातत्विक स्त्रोत्र:  जैसा की आप सभी जानते है इतिहास की सत्यतता का प्रमाण पाए जाने वाले अवशेषों एवं कुछ ऐसी सामग्रियों से मिलती है जो आज से बहुत प्राचीन होने के साथ साथ हमे उस समय के सभी अस्तित्वों का बोध कराता हो । जंहा से इन सभी अस्तिहितवो का बोध होता है उसे ही पुरात्विक स्त्रोत्र कहते है। आज हम ऐसे ही पुरात्विक स्त्रोत्रों के बारे में आपको बताना चाहते है जो राजस्थान के इतिहास को प्रमाणीत करता है। 

पुरातात्विक प्रमाणों की जानकारी से पहले हम आपको राजस्थान के इतिहास के जनक एवं इतिहास के जनक के बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध करा रहे है क्योंकि इन विद्वानों ने ही इतिहास के प्रमाणों को पूरी दुनिया के सामने लाया था। 

  • अगर सम्पूर्ण विश्व की बात करे तो तो हेरोडोटस को इतिहास का जनक कहा जाता है इन्होने इतिहास के सभी पहलुओं को उनके द्वारा लिखी गई पुस्तक द हिस्टॉरिक में सम्पूर्ण विवेचन किया है। 
  • यदि भारत की बात की जाये तो भारत में इतिहा के जनक महर्षि वेदव्यास जी का मन जाता है क्योंकि इन्होने ही महाभारत लिखा था। कहा जाता है की यह महाभारत कोरवो एवं पांडवो के बिच हुए अधर्म पर धर्म की जित का सम्पूर्ण सार है। जिसमे धर्मार्थ परमो धर्म जैसे प्रमुख उपदेश भी दिए है।
  • यदि राजस्थान की बात की जाये तो राजस्थान इतिहास के जनक कर्नल जेम्स टॉड है। इन्होने राजस्थान के इतिहास की सम्पूर्ण उल्लेख उनकी पुस्तकों एवं रचनाओं से मिलता है। कर्नल जेम्स टॉड का जन्म स्कॉटलैंड में हुआ था। इनके गुरु का नाम यति ज्ञानचंद जी था। टॉड को एक उपनाम भी दिया गया है “घोड़े वाले बाबा”। 

जेम्स टॉड की इतिहास की पुस्तके:

Contents

  • एनल्स एन्ड एक्टिक्योटीज ऑफ़ राजस्थान:  इस बुक के 2 मुख्य संस्करण है इसके पहले संस्करण में मेवाड़ का इतिहास है जो की 1829 में लिखा गया था एवं इनके दूसरे संस्करण में राजस्थान के अन्य रियासतों का उल्लेख मिलता है जो की 1832 में लिखा गया था। 
  • ट्रेवेल्स इन वेस्टर्न इंडिया: इस पुस्तक में पश्चिम भारत के बारे में बताया गया है एवं इसी के साथ राजस्थान की कला एवं संस्कृति पर विशेष प्रकाश डाला गया है।

इतिहास को जानने के स्त्रोत्र

इतिहास को जानने के प्रमाणों के रूप में यह मुख्यतः तीन प्रकार के होते है:-

1.पुरात्विक स्त्रोत

इस स्त्रोत में इतिहास को जानने का बोध मुख्यत इन चीज़ो से होता है:-

  • अभिलेख:- किसी भी व्यक्ति द्वारा लिखा गया लेख प्रमाण आदि अभिलेख की श्रेणी में आते है।
  • शिलालेख:- इसमें शिला अथार्थ पथर पर लिखे सभी प्रकार के लेखो ग्रंथो उपनिषदों आदि का प्रमाण मिलता है।
  • प्रशश्ति:- इसमें राजाओ द्वारा अपनी प्रशंशा या किसी अन्य द्वारा लिखे गए प्रशंशा लेखो का विवेचन किया जाता है।
  • सिक्के:- प्राचीन समय में राजाओ एवं शासको द्वारा समय समय पर अनेको मुद्राये चलाई गई थी इन सभी सिक्को से भी इतिहास का प्रमाण मिलता है।
  • ताम्रपात्र लेख 

2.  पुरालेखीय स्त्रोत्र

  • बहिया: इसमें सभी लोगो एवं उनकी सभी पीढ़ी का उल्लेख मिलता है की वर्तमान में कोई व्यक्ति किसका वंशज रहा है इसके सभी जानकारिया उस बहिया में होता है ( जैसे अभी राम मंदिर के निर्माण के समय हाई कोर्ट के द्वारा श्री राम जी के वास्तविकता में होने का प्रमाण राजस्थान के ही रघुवंशीय परिवार ने दिया है जिमसे श्री राम जी का उल्लेख है। यदि एक बार बहिया में किसी के अस्तित्व की प्रमाणिकता हो जाये तो कोई भी न्यायालय इसे चेलेंज नहीं कर सकता है। )
  • फरमान: प्राचीन समय में मुग़ल बादशाओ एवं शाशको द्वारा बहुत से फरमान जारी होते है। ( जैसा की मुगलो द्वारा भारत में हिन्दुओ-m गैर मुस्लिम लोगो पर एक कर लगाया जिसे जजिया कर कहा जाता है। यह मुहमद बिन कासिम के आक्रमण के बाद भरत में लगाया गया था। इसके बाद भी कंही मुग़ल शासको द्वारा जजिया कर वसूला गया। दिल्ली के प्रथम सुल्तान तुगलक द्वारा तो यह कर सभी हिन्दू सहित ब्राह्मणो के लिए भी लागु कर दिया गया था।)
  • त्वरिखे:- यह पुरालेखीय स्त्रोत्र फारसियो के हुकूमत के समय से प्रमाणित है।

3. साहित्य स्त्रोत्र

इसमें सभी ऐतिहासिक ग्रंथो, ऐतिहासिक पुस्तकों आदि से इतिहास का प्रमाण मिलता है

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